Tuesday, July 21

“वर दे वीणा वादिनी” गायन से प्रारंभ हुई ग़ज़लांजलि संस्था की काव्य-गोष्ठी

उज्जैन: पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी की अनुपम कृति “वर दे वीणा वादिनी, वर दे…” के सामूहिक गायन से ग़ज़लांजलि साहित्यिक संस्था की हालिया काव्य-गोष्ठी का भव्य आरंभ हुआ।

कार्यक्रम को ऊँचाई प्रदान करते हुए डॉ. आर. पी. तिवारी ने देशभक्ति गीत “यह अस्तित्व प्रतीक देश का, राष्ट्रध्वज सम्मान, भारत माँ की विजय पताका इसकी अनुपम शान…” प्रस्तुत किया। तत्पश्चात विनोद काबरा ने अपनी आध्यात्मिक रचना “आत्मानंद में अनुभूति के लिए पुकार है, जीवन के अंतर्तम में सिमट जाना…” सुनाई।

अशोक रक्ताले ने ग़ज़ल “तुम्हारे जिस्म को सोना बना देती है, जो आ कर, वो सारी धूप ले जाती है, शामें साथ फुसलाकर…” पढ़ी, जबकि अवधेश वर्मा नीर ने समाज में बढ़ते असंतोष पर आधारित रचना “आज मनुष्य समृद्ध भौतिक रूप से, पर असंतुष्ट ही रहता परिवार…” प्रस्तुत की।

विजयसिंह गहलोत साकित ने गीत “जाम दे, जाम दे साकिया, मेरा दिल चन्द लम्हों में बहल जाएगा, सारे उमड़े हुए अश्क थम जाएँगे, बेकरारी का ये आलम बदल जाएगा…” सुनाया। कविता रामदास समर्थ ने प्रेरणादायक कविता “जब तक धरा पर मैं रहूंगी, तृप्त जन मानस रहेगा, शांत मन का ताप होगा…” पढ़ी।

संस्था ने वर्ष भर साहित्य उत्थान के लिए आयोजित कार्यक्रमों में व्यंग्य और सामाजिक भावनाओं को भी स्थान दिया। इस क्रम में प्रफुल्ल शुक्ला सरकार ने “प्रेमी मन की पीड़ा को दिल में डालकर, कहीं एकांत में बैठकर आँसू बहाते हैं…” रचना प्रस्तुत की। शायर आशीष अश्क ने जीवन पर आधारित ग़ज़ल “ज़िन्दगी ऐसी गुजारी उम्रभर, जैसे कोई अजनबी के साथ है…” पढ़ी। इसके साथ ही डॉ. अखिलेश चौरे, डॉ. विजय सुखवानी और आरिफ अफ़ज़ल ने भी अपनी कुछ चयनित ग़ज़लें सुनाईं।

कार्यक्रम की समीक्षा डॉ. हरिमोहन बुधौलिया ने की, जबकि अध्यक्षता डॉ. श्रीकृष्ण जोशी ने संभाली।

गोष्ठी ने साहित्य प्रेमियों और श्रोताओं को मनोरंजन के साथ-साथ गहन भावनात्मक अनुभव प्रदान किया।

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