Tuesday, July 21

जलता बांग्लादेश: भारत के सामने 1971 के बाद सबसे बड़ी चुनौती, पाँच गंभीर संकट खड़े

नई दिल्ली: बांग्लादेश में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और यह भारत के लिए 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद का सबसे बड़ा रणनीतिक और कूटनीतिक संकट बन गया है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अगुवाई वाली संसदीय समिति की रिपोर्ट में सामने आया है कि बांग्लादेश में राजनीतिक बदलाव, अल्पसंख्यकों पर हमले और बाहरी ताकतों की बढ़ती दखलंदाजी भारत के लिए कई गंभीर चुनौतियां पैदा कर रही हैं।

पाँच बड़े संकट:

  1. अल्पसंख्यकों के अस्तित्व पर संकट
    रिपोर्ट के अनुसार, अवामी लीग के कमजोर होने, युवाओं की अगुवाई वाले राष्ट्रवाद के बढ़ने और इस्लाम के प्रभुत्व के फिर से प्रवेश के कारण अल्पसंख्यक, खासकर हिंदू समुदाय, सबसे अधिक प्रभावित हैं। इस साल 18 मई तक ही 2,446 हमले अल्पसंख्यकों पर दर्ज किए गए। भारत बार-बार चिंता जता रहा है, लेकिन बांग्लादेश सरकार ने इस पर गंभीर ध्यान नहीं दिया।
  2. राजनीतिक अस्थिरता और नए संगठन
    नेशनल सिटीजन पार्टी नामक छात्रों का नया संगठन, जमात-ए-इस्लामी का फिर से पंजीकरण और अवामी लीग का चुनावी प्रतिबंध भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हैं।
  3. चीन की बढ़ती दखलंदाजी
    बांग्लादेश में चीन ने मोंगला बंदरगाह का विस्तार किया है और RCEP में शामिल होने की संभावना है। भारत ने सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मोंगला और चटोग्राम पोर्ट के उपयोग के लिए समझौते किए हैं।
  4. शेख हसीना का भारत में होना
    सत्ता से बेदखल होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में हैं। बांग्लादेश सरकार उन्हें भारत में राजनीतिक गतिविधियों के लिए दोषी ठहरा रही है, जिससे भारत पर दबाव बढ़ रहा है।
  5. भारत की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती
    बांग्लादेश में पाकिस्तानी और कट्टरपंथी ताकतों की सक्रियता बढ़ गई है। आईएसआई और अन्य उग्रवादी संगठन भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए सुरक्षित मंच बना सकते हैं।

निष्कर्ष:
संसदीय समिति की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत को बांग्लादेश में बिगड़ते हालात पर सावधानीपूर्वक रणनीति अपनानी होगी। न केवल कूटनीतिक, बल्कि सुरक्षा और अल्पसंख्यकों के संरक्षण के दृष्टिकोण से भी भारत के लिए यह एक गंभीर और बहुपक्षीय चुनौती है।

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