Tuesday, July 21

सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को दी बड़ी हिदायत: जांच में देरी पर ही तय करें समय-सीमा

 

 

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों की तरफ से जांच एजेंसियों के लिए समय-सीमा निर्धारित करने पर अहम निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अदालतों को एजेंसियों की जांच में बिना वजह हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और केवल तभी समय-सीमा तय करनी चाहिए, जब जांच में स्पष्ट रूप से देरी हो रही हो।

 

जस्टिस संजय करोल और एन.के. सिंह की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य पुलिस को जाली दस्तावेजों के आधार पर हथियारों के लाइसेंस हासिल करने के मामले में 90 दिन में जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना “एजेंसियों के काम में हस्तक्षेप” जैसा होगा।

 

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण:

 

टाइमलाइन केवल तब निर्धारित की जाती है, जब जांच ठप हो रही हो या देरी का पैटर्न स्पष्ट हो।

बिना वजह अदालतों द्वारा समय-सीमा तय करना उचित नहीं, क्योंकि यह जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर असर डालता है।

तेज़ और निष्पक्ष जांच संविधान के अनुच्छेद 21 का हिस्सा है और क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

 

बेंच ने कहा कि न्यायपालिका का काम जांच की वास्तविकता और संवैधानिक आदेश के बीच संतुलन बनाना है। इस संतुलन से ही जांच, कार्यवाही और ट्रायल उचित गति और सावधानी के साथ पूरी हो सकती है।

 

सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के माध्यम से अदालतों और जांच एजेंसियों के बीच स्वतंत्रता और जवाबदेही का संतुलन स्पष्ट किया है, ताकि न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनी रहे।

 

 

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