Tuesday, July 21

जीआई टैग मिलते ही ‘मर्चा चूड़ा’ ने मचाया गर्दा मकर संक्रांति पर रिकॉर्ड मांग, दिल्ली–मुंबई तक फैली पश्चिम चंपारण के स्वाद की धूम

 

 

 

पटना।

बिहार के पश्चिम चंपारण की पहचान बन चुका मर्चा चूड़ा अब सिर्फ स्थानीय स्वाद नहीं रहा। जीआई टैग मिलने के बाद इस पारंपरिक चूड़े ने देशभर में अपनी खुशबू और स्वाद का डंका बजा दिया है। मकर संक्रांति के मौके पर इसकी मांग ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई है और दिल्ली, मुंबई, गुजरात से लेकर हैदराबाद तक लोग इसे खास तौर पर मंगवा रहे हैं।

 

जीआई टैग ने बदली मर्चा चूड़ा की किस्मत

 

नवंबर 2023 में मर्चा चावल को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) मिलने के बाद से इसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई है। पश्चिम चंपारण के रामनगर, गौनाहा, मैनाटांड, चनपटिया, नरकटियागंज और लौरिया क्षेत्रों में उगने वाला यह सुगंधित धान अब वैश्विक बाजार में भी चर्चा का विषय बन गया है। मकर संक्रांति के दौरान दही-गुड़ के साथ मर्चा चूड़ा लोगों की पहली पसंद बन चुका है।

 

मकर संक्रांति में ‘जो मांगो, वही रेट’

 

स्थानीय किराना दुकानदार राजेश गुप्ता बताते हैं कि मर्चा चूड़ा सालभर बिकता है, लेकिन मकर संक्रांति के समय इसकी मांग कई गुना बढ़ जाती है।

उन्होंने कहा, “पहले इसका थोक भाव 50 से 70 रुपये किलो था, जो अब बढ़कर 90 से 110 रुपये किलो हो गया है। खुदरा बाजार में यह 150 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।”

मर्चा चूड़ा 1 किलो और 5 किलो के पैकेट में बाजार में उपलब्ध है।

 

दिल्ली वाले रिश्तेदार भी हुए दीवाने

 

ग्राहक मुनीलाल प्रसाद बताते हैं कि तीन साल पहले दिल्ली से आए रिश्तेदारों ने जब पहली बार मर्चा चूड़ा खाया, तो वे इसके स्वाद और खुशबू के कायल हो गए।

उन्होंने कहा, “अब हर साल मकर संक्रांति से पहले दिल्ली से 10–15 किलो मर्चा चूड़ा कूरियर से मंगवाते हैं। वहां उनके दोस्त भी इसकी मांग करने लगे हैं।”

 

खेती का रकबा तीन गुना बढ़ा, किसान खुश

 

रामनगर के किसान विजय तिवारी के अनुसार, मर्चा धान की खेती का रकबा 1,000 हेक्टेयर से बढ़कर करीब 3,000 हेक्टेयर हो गया है। बेहतर दाम और बढ़ती मांग ने किसानों को इस पारंपरिक फसल की ओर फिर से आकर्षित किया है।

 

बासमती नहीं, फिर भी खुशबू में बेजोड़

 

कृषि वैज्ञानिक विनय कुमार बताते हैं कि मर्चा चावल बासमती नहीं, बल्कि छोटे दाने वाला सुगंधित चावल है।

उन्होंने कहा, “इस चावल की खासियत इसकी प्राकृतिक खुशबू है, जो पौधे से लेकर चूड़ा बनने तक बनी रहती है। इससे बना चूड़ा नरम, हल्का मीठा और बेहद स्वादिष्ट होता है।”

 

नदियों और मिट्टी ने बढ़ाई खुशबू की ताकत

 

विशेषज्ञों के अनुसार, बूढ़ी-गंडक और सिकरहना नदियों के किनारे की खनिज-युक्त मिट्टी और अक्टूबर–नवंबर का कम तापमान मर्चा चावल की सुगंध को और दमदार बनाता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में उगा मर्चा चावल बाकी जगहों से अलग पहचान रखता है।

 

बिहार की 23वीं जीआई टैग फसल

 

मर्चा धान उत्पादक समूह के सदस्यों के अनुसार, नवंबर 2021 में जीआई टैग के लिए आवेदन किया गया था और 2023 में चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने इसे मंजूरी दी।

कतरनी चावल के बाद यह बिहार की दूसरी और कुल 23वीं फसल है, जिसे जीआई टैग का गौरव प्राप्त हुआ है।

 

 

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