Tuesday, July 21

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अमेरिकी लॉबी फर्म की मदद क्यों ली? FARA फाइलिंग से हुआ खुलासा

नई दिल्ली/वॉशिंगटन।
अमेरिका के न्याय विभाग (DoJ) की फॉरेन एजेंट रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) फाइलिंग से यह खुलासा हुआ है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने वॉशिंगटन में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के लिए एक अमेरिकी लॉबी फर्म की सेवाएं ली थीं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया, जब पाकिस्तान ने भी बड़े पैमाने पर अमेरिकी प्रशासन के भीतर लॉबिंग तेज कर रखी थी।

FARA वेबसाइट पर दिसंबर 2025 में अपलोड दस्तावेजों के अनुसार, अमेरिकी लॉबी फर्म SHW LLC को भारतीय दूतावास ने 24 अप्रैल 2025 को हायर किया था। यह तारीख पहलगाम आतंकी हमले के ठीक दो दिन बाद की है, जब भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ने की आशंका तेज हो गई थी।

किनकिन से संपर्क कराने को कहा गया?

फाइलिंग के मुताबिक, SHW LLC को निर्देश दिया गया था कि वह

  • भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर
  • अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो
  • वॉशिंगटन स्थित भारतीय राजदूत

की बैठकों को अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों—उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ—के साथ शेड्यूल कराने में मदद करे।

इसके अलावा, 10 मई 2025 को, जिस दिन भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर की घोषणा हुई, उसी दिन भारतीय दूतावास ने व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के रिकी गिल से संपर्क किया। बातचीत का विषय भारत-पाक संघर्ष से जुड़ी मीडिया कवरेज बताया गया है।

पाकिस्तान की लॉबिंग का जवाब?

इससे पहले सामने आई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने भारत की सैन्य कार्रवाई के दौरान अमेरिकी अधिकारियों से करीब 60 बार संपर्क किया और अलग-अलग स्तरों पर बैठकें कीं। ऐसे में भारतीय पक्ष के अनुसार, यह कदम पाकिस्तान की आक्रामक लॉबिंग को काउंटर करने और अमेरिकी सत्ता तंत्र तक भारत का पक्ष सीधे पहुंचाने के लिए जरूरी हो गया था।

दूतावास की सफाई

द हिंदू के सवालों पर भारतीय दूतावास ने लॉबी फर्म हायर करने से इनकार नहीं किया, लेकिन इसे अमेरिका में एक सामान्य और पुरानी प्रक्रिया बताया। दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि 1950 के दशक से ही भारत, स्थानीय जरूरतों और प्रथाओं के अनुसार, ऐसी फर्मों की सेवाएं लेता रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया कि 10 मई 2025 को शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों से संपर्क विशेष रूप से क्यों कराया गया।

ट्रंप के मध्यस्थता दावों से जुड़ा संदर्भ

यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार भारत-पाकिस्तान संघर्ष को खत्म कराने में अपनी मध्यस्थ भूमिका का दावा करते रहे हैं। भारत सरकार इन दावों को लगातार खारिज करती आई है। दिलचस्प बात यह है कि जिन अधिकारियों को ट्रंप प्रशासन ने संघर्ष रोकने में भूमिका के लिए सम्मानित किया, उनसे संपर्क कराने में भी इसी लॉबी फर्म की भूमिका फाइलिंग में दर्ज है।

भारत का रुख क्या कहता है?

सरकारी सूत्रों और पूर्व राजनयिकों के मुताबिक,

  • बैठकें और कॉल सीधे राजनयिक स्तर पर ही होती हैं।
  • लॉबी फर्मों की भूमिका मुख्य रूप से रास्ते खोलने, हालात समझने और सलाह देने तक सीमित रहती है।
  • ट्रंप प्रशासन के दौरान वॉशिंगटन में बातचीत के नए तौर-तरीकों के कारण भारत को भी व्यावहारिक रुख अपनाना पड़ा।

सूत्रों का यह भी कहना है कि भारत का यह कदम पाकिस्तान जैसी “स्थायी लॉबिंग रणनीति” अपनाने से अलग है और इसे अस्थायी, परिस्थितिजन्य और रणनीतिक आवश्यकता के तौर पर देखा जाना चाहिए।

निष्कर्ष

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिकी लॉबी फर्म की सेवाएं लेना भारत की विदेश नीति में किसी बदलाव से ज्यादा, उस समय की कूटनीतिक मजबूरी और रणनीतिक संतुलन का संकेत देता है। पाकिस्तान की तीव्र लॉबिंग, अमेरिकी सत्ता संरचना के बदले हुए नियम और अंतरराष्ट्रीय जनमत—इन सभी के बीच भारत ने अपने हितों की रक्षा के लिए यह रास्ता चुना।

 

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