Wednesday, July 22

झूठी एफआईआर दर्ज कराने पर होगी कार्रवाई, शिकायतकर्ता पर चलेगा मुकदमा: इलाहाबाद हाई कोर्ट

 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने झूठी एफआईआर दर्ज कराने को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए एक अहम आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यदि पुलिस जांच में यह पाया जाता है कि एफआईआर झूठी सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई है, तो विवेचना अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठी गवाही और जांच को गुमराह करने के आरोप में लिखित परिवाद दर्ज कराए।

 

कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि विवेचना अधिकारी ऐसा करने में लापरवाही बरतता है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 199(बी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकलपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।

 

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि असंज्ञेय अपराधों (नॉन-कॉग्निजेबल मामलों) में पुलिस द्वारा दाखिल की गई रिपोर्ट को ‘स्टेट केस’ नहीं माना जा सकता, बल्कि उसे परिवाद (कंप्लेंट केस) के रूप में ही देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने इसी आधार पर अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें असंज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह संज्ञान लिया गया था।

 

अलीगढ़ के क्वार्सी थाने से जुड़ा है मामला

 

मामले के अनुसार, अलीगढ़ के थाना क्वार्सी क्षेत्र में एक पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ अपमान, अज्ञात संचार के माध्यम से आपराधिक धमकी देने और शांतिभंग की आशंका जताते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी कोरिया में किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है और सोशल मीडिया के माध्यम से उसे व उसकी बेटी को बदनाम कर रही है। साथ ही भारत लौटने पर जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगाया गया था।

 

पुलिस जांच में आरोप झूठे पाए गए

 

पुलिस ने मामले की जांच के बाद आरोपों को झूठा मानते हुए 19 जून 2024 को फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी। इसके बाद पति ने फाइनल रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की। 23 अक्टूबर 2024 को अलीगढ़ के सीजेएम ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए फाइनल रिपोर्ट खारिज कर दी और मामले को स्टेट केस के रूप में चलाने का आदेश दिया।

 

हाई कोर्ट ने सीजेएम के इस आदेश को कानून के विरुद्ध मानते हुए निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि असंज्ञेय मामलों में इस तरह की प्रक्रिया अपनाना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट के इस फैसले को झूठे मुकदमों पर लगाम लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

 

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