Tuesday, July 21

ग्रीनलैंड विवाद में रूस की चुप्पी, ट्रंप की धमकियों में पुतिन को दिख रहा बड़ा मौका

 

मॉस्को: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर किसी भी कीमत पर नियंत्रण की जिद ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। यूरोप के कई देश जहां इस योजना को लेकर खुलकर या दबी जुबान में विरोध जता रहे हैं, वहीं रूस इस पूरे मुद्दे पर रणनीतिक दूरी बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस इस स्थिति को पश्चिमी एकता को कमजोर करने के अवसर के रूप में देख रहा है।

 

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ग्रीनलैंड विवाद पर साफ कहा है कि यह मुद्दा रूस से जुड़ा नहीं है और अमेरिका व उसके नाटो सहयोगी इसे आपस में सुलझा लेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में पुतिन ने कहा, “ग्रीनलैंड का भविष्य हमारा विषय नहीं है। डेनमार्क ने हमेशा ग्रीनलैंड को एक तरह से कॉलोनी की तरह देखा है। यह एक अलग मामला है और इसमें रूस की कोई भूमिका नहीं है।”

 

पुतिन ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1917 में डेनमार्क ने वर्जिन आइलैंड्स को अमेरिका को बेच दिया था और 1867 में रूस ने अलास्का को अमेरिका को सौंप दिया था। इन उदाहरणों के जरिए उन्होंने संकेत दिया कि क्षेत्रीय सौदे नई बात नहीं हैं।

 

अमेरिका-यूरोप तनाव से रूस को फायदा

 

विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति ने अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ा दिया है, जिसका सीधा फायदा रूस को मिल सकता है। इससे एक ओर यूरोपीय संघ और नाटो की एकजुटता कमजोर होती है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों का ध्यान यूक्रेन युद्ध से हटकर अमेरिका की आंतरिक रणनीतियों पर चला जाता है। यह दोनों ही स्थितियां मॉस्को के हित में हैं।

 

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन की चुप्पी या सीमित समर्थन दरअसल एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल है, जिससे पश्चिमी देशों के बीच मतभेद और गहरे हो सकते हैं।

 

‘बोर्ड ऑफ पीस’ में भी दिख रही रणनीति

 

इसी बीच डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि पुतिन उनके प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने पर सहमत हो गए हैं। हालांकि, रूसी राष्ट्रपति ने कहा है कि उन्होंने अपने विदेश मंत्रालय को इस प्रस्ताव का अध्ययन करने को कहा है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका और रूस दोनों ही इस समय कूटनीतिक अवसरों का अपने-अपने तरीके से फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड विवाद भले ही सीधे रूस से जुड़ा न हो, लेकिन इसके जरिए पुतिन को पश्चिमी खेमे में दरार डालने और यूक्रेन युद्ध के दबाव को कम करने का मौका जरूर मिलता दिख रहा है।

 

 

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