Tuesday, July 21

प्राइवेट स्कूलों में RTE एडमिशन: बस सीट देना काफी नहीं, गरीब बच्चों के लिए आरक्षण अधूरा है

नई दिल्ली: निजी स्कूलों में आरटीई (Right to Education) कोटा के तहत 25% सीटों पर दाखिले का नियम लागू है। लेकिन केवल सीट मिलने से ही गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित नहीं होती। IIT कानपुर और वाधवानी स्कूल ऑफ AI के प्रोफेसर विमल कुमार बताते हैं कि नीति का उद्देश्य नेक है, लेकिन इसे लागू करने में कई चुनौतियां हैं।

मुख्य चुनौतियां:

  1. सीखने की कुल लागत: शिक्षा केवल फीस की बात नहीं है। गरीब परिवारों को किताबें, यूनिफॉर्म, स्टेशनरी, ट्रांसपोर्ट और स्कूल प्रोजेक्ट्स में भी खर्च करना पड़ता है। कई स्कूलों में कैंटीन का खाना और स्पोर्ट्स किट अनिवार्य हैं।
  2. बजट के बाहर खर्च: माहवारी अतिरिक्त खर्च कई गरीब परिवारों की कुल आय का 40-50% तक हो सकता है।
  3. छिपी हुई लागत: आवेदन प्रक्रिया, दस्तावेज़ तैयार करना, पोर्टल की तकनीकी जटिलताएं आदि परिवार के लिए समय और अवसर की लागत बढ़ाते हैं।
  4. मनोवैज्ञानिक दीवार: बच्चे अपने सहपाठियों से अलग महसूस करते हैं। ब्रांडेड कपड़े, टिफिन, जन्मदिन पार्टियां और ट्रिप्स जैसी चीजें उन्हें सामाजिक रूप से अलग कर देती हैं और सीखने की उत्पादकता घटाती हैं।
  5. परिवेश का अंतर: घर का वातावरण और संसाधनों की कमी के कारण बच्चा स्कूल में तो उपस्थित होता है, लेकिन धीरे-धीरे पिछड़ जाता है।
  6. लोरिटर्न निवेश: शिक्षा के अच्छे परिणाम के लिए केवल सीट पर्याप्त नहीं; पोषण, सुरक्षित घर, अध्ययन का माहौल और अतिरिक्त सहायता भी जरूरी हैं।

समाधान के सुझाव:

  • गरीब बच्चों के लिए सपोर्ट पैकेज: यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट और अतिरिक्त ट्यूटरिंग के लिए फंड उपलब्ध कराना।
  • स्कूलों में इनक्लूजन कल्चर विकसित करना: बडी सिस्टम और इनक्लूजन कोऑर्डिनेटर जैसे पायलट प्रोजेक्ट्स में सीखने का स्तर 30% तक बढ़ा।
  • सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारना: निजी स्कूलों के बराबर सरकारी स्कूल होने तक, बच्चों को न्याय की यह कोशिश अधूरी रहेगी।

निष्कर्ष: नीति का लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि बच्चा किस स्कूल में बैठा है, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह क्या सीख रहा है।

 

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