Tuesday, July 21

ताजे पानी के बहाव से भारत की एकमात्र उल्कापिंड झील को गंभीर खतरा, लोनार लेक का जलस्तर 20 फीट बढ़ा

पुणे: महाराष्ट्र की ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण लोनार झील आज गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है। लगभग 50 हजार वर्ष पहले उल्कापिंड के टकराव से बनी यह झील न केवल भूगर्भीय दृष्टि से अद्वितीय है, बल्कि मंगल ग्रह की सतह के अध्ययन के लिए पृथ्वी पर मौजूद सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक उदाहरणों में से एक भी मानी जाती है।

हाल ही में झील में अत्यधिक मीठे पानी के प्रवेश से इसके पारिस्थितिकी तंत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। लंबे समय तक झील की उच्च क्षारीय प्रकृति (पीएच स्तर लगभग 11.5) के कारण केवल विशिष्ट सूक्ष्मजीव और जैव विविधता ही जीवित रह पाती थी, लेकिन अब पहली बार यहां मछलियों की मौजूदगी दर्ज की गई है।

हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान

जलस्तर में लगातार हो रही वृद्धि ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। झील के किनारे स्थित 15 प्राचीन मंदिरों में से 9 अब आंशिक या पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। देवी कमलजा के मंदिर तक पानी पहुंचने से स्थानीय लोगों की धार्मिक भावनाएं भी आहत हुई हैं।

हाइड्रोजियोलॉजिस्ट और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर अशोक तेजंकर के अनुसार, बीते दो वर्षों में झील का जलस्तर करीब 20 फीट तक बढ़ गया है। उनके अध्ययन में सामने आया कि आसपास के क्षेत्रों में गहरे बोरवेल्स ने बेसाल्ट चट्टानों की प्राकृतिक जल-अवरोधक परतों को तोड़ दिया है, जिससे भूजल सीधे झील में मिल रहा है।

पहले थे सिर्फ दो मीठे पानी के स्रोत

पहले झील में केवल दो मीठे पानी के स्रोत — धार (गोमुख) और सीतनहानी — सक्रिय थे। अब राम गया और पापरेश्वर नामक दो नए जलस्रोत भी सक्रिय हो गए हैं, जिससे झील में लगातार भारी मात्रा में पानी आ रहा है। इस वजह से झील का पीएच स्तर लगभग 8.5 तक गिर गया है, जिससे इसकी विशिष्ट रासायनिक संरचना खतरे में है।

विरोधाभास यह है कि झील में पानी भर रहा है, लेकिन लोनार कस्बा अब भी जल संकट से जूझ रहा है। गांव को महीने में केवल एक बार नल से पानी मिलता है और लोग टैंकरों तथा बोरवेल्स पर निर्भर हैं।

संरक्षण के सुझाव

तेजंकर ने सुझाव दिया है कि झील में आने वाले झरनों के पानी को नीचे ही रोका जाए और शुद्धिकरण के बाद गांव की जल आपूर्ति के लिए उपयोग किया जाए। इससे झील का स्तर भी नियंत्रित रहेगा और स्थानीय लोगों को स्थायी समाधान मिलेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि लोनार झील के संरक्षण की योजनाएं फिलहाल कागजों तक सीमित हैं। प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण का स्थानीय किसानों द्वारा विरोध किया जा रहा है, जबकि वन विभाग कहता है कि वे समाधान तलाश रहे हैं, लेकिन वन्यजीव संरक्षण कानून की सीमाओं के कारण कदम सीमित हैं।

लोनार झील का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि विकास, संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाता है।

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