Tuesday, July 21

बिहार: विधायक बनने के लिए जमीन बिकी, सतीश प्रसाद सिंह को उनके धैर्य ने बनाया पहला ओबीसी मुख्यमंत्री

पटना: बिहार की राजनीति में 28 जनवरी 1968 ऐतिहासिक दिन बन गया। इस दिन सतीश प्रसाद सिंह बिहार के पहले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह कार्यकाल केवल पाँच दिन का था, लेकिन उनके धैर्य और राजनीतिक कौशल ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया।

सतीश प्रसाद सिंह का राजनीतिक सफर
मुंगेर जिले के कुरचक्का गांव से आने वाले सतीश प्रसाद सिंह जमींदार परिवार से थे। राजनीति में उनकी रुचि पढ़ाई के दौरान ही जाग गई थी। उनका चुनावी सफर चुनौतियों भरा रहा।

  • 1962: स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर पहला चुनाव हार गए।

  • 1964: उपचुनाव में फिर हार, यहां तक कि चुनाव जीतने के लिए जमीन भी बिक गई।

  • 1967: तीसरी बार संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े और पहली बार जीत दर्ज की।

इस जीत ने उन्हें बिहार की राजनीति में नई पहचान दिलाई और उनके संकल्प को साबित किया।

1967 का राजनीतिक उथल-पुथल का वर्ष
महामाया प्रसाद सिन्हा की सरकार जल्दी ही गिर गई। इस दौरान कांग्रेस के भीतर असंतोष और नए समीकरण बन रहे थे। सतीश प्रसाद सिंह ने बीपी मंडल और भोला प्रसाद सिंह जैसे नेताओं के साथ मिलकर शोषित दल का गठन किया। कांग्रेस ने यह मौका भुनाते हुए तय किया कि पिछड़ा वर्ग के नेताओं को बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनाया जाएगा।

28 जनवरी 1968: पहला ओबीसी मुख्यमंत्री
कांग्रेस की रणनीति के तहत 28 जनवरी 1968 को सतीश प्रसाद सिंह पहले कुशवाहा ओबीसी मुख्यमंत्री बने। हालांकि राजनीतिक समीकरणों के कारण उनका कार्यकाल केवल 1 फरवरी 1968 तक रहा। उन्होंने अपनी पहली कैबिनेट में केवल दो मंत्री शामिल किए और पहला महत्वपूर्ण निर्णय बीपी मंडल को विधान परिषद भेजना लिया।

इतिहास में अमर कार्यकाल
सतीश प्रसाद सिंह का यह पांच दिन का कार्यकाल छोटा था, लेकिन यह बिहार में ओबीसी नेतृत्व की शुरुआत का प्रतीक बन गया। उनके धैर्य, संघर्ष और दूरदर्शिता ने उन्हें बिहार के इतिहास में स्थायी स्थान दिलाया।

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