Tuesday, July 21

भीड़-भाड़ भरी दिल्ली से रोज लापता हो रहे बच्चे, 695 मासूम आज भी घरवालों का इंतजार कर रहे हैं

नई दिल्ली: दिल्ली में गरीब परिवारों के छोटे बच्चे अक्सर काम और रोजी-रोटी की भागदौड़ में अपने माता-पिता की नजरों से ओझल हो जाते हैं। पिछले 11 वर्षों में राजधानी में 0 से 8 साल के 5,559 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 4,864 को पुलिस ने ढूंढ निकाला, लेकिन 695 बच्चे अब भी अपने परिवारों का इंतजार कर रहे हैं

आंकड़ों के मुताबिक, हर साल लापता बच्चों में लड़कों की संख्या लड़कियों से अधिक रहती है। उदाहरण के लिए, 2025 में 850 बच्चे लापता हुए थे, लेकिन 23 दिसंबर 2025 तक यह संख्या घटकर 360 रह गई। वहीं, 2025 में पुलिस 146 बच्चों को खोजने में नाकाम रही, जबकि 2019 में 559 लापता बच्चों में से 119 नहीं मिल पाए थे।

पूर्व एसीपी और क्राइम ब्रांच की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) के अधिकारी सुरेंद्र कुमार गुलिया के अनुसार, केवल 1 प्रतिशत बच्चे ही संगठित अपराधी या मानव तस्करी गिरोहों के शिकार होते हैं। अधिकांश मामलों में, लगभग 80 प्रतिशत बच्चे माता-पिता की लापरवाही या व्यस्तता के कारण घर से दूर हो जाते हैं। झुग्गी-झोपड़ी या जेजे कॉलोनी जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है।

पूर्व एसीपी ने बताया कि बच्चे अक्सर फोन, जल्दबाजी और ‘यहीं कही होगा’ की भरोसेमंद सोच के कारण खो जाते हैं। ऐसे समय में, बच्चे रोते-रोते किसी अनजान व्यक्ति के साथ चले जाते हैं, और अपराधी उन्हें किडनैपिंग के लिए निशाना बना लेते हैं।

पिछले साल राजधानी में कुछ सनसनीखेज किडनैपिंग मामले सामने आए।

  • 4 जून 2025: सीलमपुर मेट्रो स्टेशन से डेढ़ साल का बच्चा अगवा हुआ। सात महीने बाद पुलिस ने आरोपी को पकड़ा और बच्चे को बरामद किया।

  • 22 अगस्त 2025: यूपी के बांदा के सुरेश परिवार के छह महीने के बच्चे को सराय काले खां अड्डे पर अगवा किया गया। पुलिस ने दस आरोपियों को गिरफ्तार किया और छह मासूम बच्चों को मुक्त कराया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जबकि कुछ मामलों में अपराधियों का हाथ होता है, लेकिन अधिकतर बच्चे माता-पिता की व्यस्तता या लापरवाही के कारण खो जाते हैं। पुलिस ने पिछले साल इन मामलों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है और हर दो मामले में एक चुनौती बच्चे की बोलने-सुनने की अक्षमता बनी।

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