Tuesday, July 21

पीएम मोदी के प्रस्ताव पर नीतीश कुमार का साहसी रुख वही राजनीतिक स्टैंड, जिसके आगे अजित पवार भी हुए नतमस्तक

पटना।
बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हमेशा एक ऐसे नेता के रूप में देखा गया है, जो सत्ता से अधिक सम्मान, सिद्धांत और राज्यहित को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रस्ताव पर लिया गया उनका एक पुराना निर्णय आज भी देश की राजनीति में उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है—एक ऐसा साहसिक स्टैंड, जिसकी सराहना बाद में एनसीपी प्रमुख अजित पवार ने भी सार्वजनिक रूप से की थी।

0वीं बार शपथ, पटना पहुंचे थे अजित पवार

नवंबर 2025 में जब नीतीश कुमार ने 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब यह समारोह ऐतिहासिक बन गया। पटना के गांधी मैदान में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार विशेष रूप से उपस्थित हुए।

इस अवसर पर अजित पवार ने कहा था—

“नीतीश कुमार का 10वीं बार मुख्यमंत्री बनना न केवल बिहार, बल्कि भारतीय राजनीति के लिए भी सम्मान की बात है। बिहार की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और नीतीश कुमार जी पर भरोसा जताया है, जिसे पूरा देश देख रहा है।”

पटना बैठक से जुड़ा एनसीपी का बड़ा राजनीतिक मोड़

अजित पवार की राजनीति का एक अहम अध्याय पटना से भी जुड़ा रहा है। जुलाई 2023 में जब विपक्षी दलों की ‘इंडिया गठबंधन’ की पहली बैठक पटना में हुई, तब एनसीपी प्रमुख शरद पवार राहुल गांधी के साथ मंच पर दिखाई दिए।

इस बैठक ने महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल ला दिया।
एनसीपी के कई वरिष्ठ नेताओं को यह बात नागवार गुजरी कि शरद पवार, राहुल गांधी के नेतृत्व वाली राजनीति के साथ खड़े हों। पार्टी के भीतर असंतोष गहराने लगा। छगन भुजबल समेत कई नेताओं ने इसका खुलकर विरोध किया।

इसी राजनीतिक असंतोष का लाभ उठाकर अजित पवार ने पार्टी में बगावत की, और देखते ही देखते 54 में से 40 विधायक उनके साथ आ गए। यहीं से एनसीपी के विभाजन की औपचारिक पटकथा लिखी गई।

नीतीश कुमार की राजनीतिक सूझबूझ के कायल थे अजित पवार

अजित पवार कई मंचों से यह स्वीकार कर चुके थे कि वे नीतीश कुमार की राजनीतिक दूरदर्शिता के प्रशंसक हैं।
जून 2024 में एनसीपी के स्थापना दिवस कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट कहा था—

“केन्द्र में मंत्री पद मिलने से ज्यादा जरूरी यह है कि कोई दल अपने राज्य के हितों को मजबूती से रखे। नीतीश कुमार ने यही रास्ता दिखाया।”

उन्होंने माना कि नीतीश कुमार ने सत्ता से समझौता करने के बजाय बिहार के विकास के लिए विशेष पैकेज की मांग को प्राथमिकता दी, जो एक मजबूत और आत्मसम्मान से भरी राजनीति का उदाहरण है।

2019 का वो फैसला, जिसने देश को चौंकाया

लोकसभा चुनाव 2019 में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिला था।
बिहार से भाजपा के 17 और जदयू के 16 सांसद निर्वाचित हुए थे। भाजपा के 5 सांसद केंद्रीय मंत्री बने, जबकि जदयू को सिर्फ एक मंत्री पद की पेशकश हुई।

इस पर नीतीश कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“अगर भाजपा के 17 सांसदों से 5 मंत्री बनते हैं और जदयू के 16 सांसदों से केवल एक, तो इससे जनता के बीच गलत संदेश जाएगा।”

इसी सिद्धांत के तहत जदयू ने तीन वर्षों तक मोदी मंत्रिपरिषद से दूरी बनाए रखी। यह फैसला राजनीति में पद की नहीं, प्रतिष्ठा और समानता की लड़ाई के रूप में देखा गया।

वही स्टैंड, जिसने अजित पवार को भी सोचने पर मजबूर किया

2024 के लोकसभा चुनाव में एनसीपी (अजित पवार गुट) को केवल एक सीट मिली। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें मंत्रिपरिषद में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। लेकिन राज्य मंत्री पद मिलने पर अजित पवार ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह निर्णय सीधे तौर पर नीतीश कुमार के 2019 वाले स्टैंड से प्रेरित था—जहां सत्ता से अधिक आत्मसम्मान और राजनीतिक संतुलन को तरजीह दी गई।

सिद्धांत की राजनीति का प्रतीक बने नीतीश कुमार

नीतीश कुमार की राजनीति का मूल मंत्र हमेशा स्पष्ट रहा है—
“सत्ता जरूरी है, लेकिन राज्यहित और सम्मान उससे भी ऊपर।”

यही वजह है कि उनके फैसले केवल बिहार तक सीमित नहीं रहते, बल्कि देश की राजनीति में मिसाल बन जाते हैं।
और शायद यही कारण है कि एक दौर में महाराष्ट्र की सियासत के सबसे मजबूत नेता माने जाने वाले अजित पवार भी उनके राजनीतिक रुख के सामने नतमस्तक नजर आए।

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