Tuesday, July 21

UGC गाइडलाइन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, बिहार में बढ़ा राजनीतिक तापमान बीजेपी रिलैक्स, आरजेडी में मिर्ची! यूपी-बंगाल चुनाव से जुड़े नए सियासी समीकरण

पटना।
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसके बाद बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे चुनावी चाल करार दिया है, जबकि सत्ताधारी भाजपा और एनडीए नेताओं ने अदालती दखल का स्वागत किया और इसे सांस्कृतिक एकता और न्यायसंगत नियम बनाए रखने के लिए जरूरी बताया।

आरजेडी का आरोप: चुनावी जुमला

आरजेडी ने इस मुद्दे को केंद्र सरकार की चुनावी रणनीति बताया। राज्यसभा सांसद मनोज झा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ‘न्यायिक तटस्थता’ का मिथक अब टूट चुका है। पार्टी प्रवक्ता सारिका पासवान ने कहा कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश और बंगाल चुनावों को देखते हुए यह ‘जुमला’ गढ़ा था।

विपक्ष का दावा है कि नियमों में OBC वर्ग को भेदभाव विरोधी दायरे में मजबूती से शामिल किया गया है ताकि यूपी और बंगाल में भाजपा खुद को दलितों और पिछड़ों का रक्षक दिखा सके। वहीं, सवर्ण वर्ग में इस नियम को लेकर नाराजगी है, जिसे विपक्ष ‘विभाजनकारी नीति’ के रूप में पेश कर रहा है।

भाजपा का पलटवार और कोर्ट पर भरोसा

भाजपा प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने कहा कि कांग्रेस और आरजेडी ने दशकों तक दलित-पिछड़ों को सिर्फ वोट बैंक माना। सांसद मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि सरकार और यूजीसी अदालत में अपना पक्ष रखेंगे। शिक्षा मंत्री पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव या अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

सांस्कृतिक एकता और सनातन मूल्यों की रक्षा

बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करने की बात कही। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इस रोक का स्वागत किया और इसे भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए जरूरी बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार भी व्यक्त किया।

साथ ही, लोजपा (रामविलास) सांसद अरुण भारती ने कहा कि अदालत के माध्यम से सभी पक्षों की सुनवाई सुनिश्चित होगी, जिससे कानून और न्याय दोनों की रक्षा होगी।

चुनावी असर

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश यूपी और बंगाल चुनावों के पहले राजनीतिक रणनीति को प्रभावित कर सकता है। विपक्ष इसे भाजपा के वोट बैंक गणित का हिस्सा मान रहा है, जबकि सत्ताधारी दल इसे सांस्कृतिक-सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बता रहा है।

 

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