Tuesday, July 21

UGC नियम पर रोक से राजद को क्यों लगा बड़ा झटका? पिछड़ावाद की राजनीति और ‘सीक्रेट एजेंडा’ पर फिरा पानी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाए जाने के बाद बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है। यह फैसला केवल शैक्षणिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा असर पिछड़ावाद की राजनीति पर भी पड़ा है। खासकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को इससे ऐसा झटका लगा है, जिसे पार्टी के भीतर एक बड़े राजनीतिक अवसर के हाथ से निकल जाने के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल, सत्ता से दूर चल रही राजद को यूजीसी के नए नियमों में एक ऐसा मुद्दा नजर आया था, जिसके सहारे वह बिहार की राजनीति को एक बार फिर मंडल युग’ की धुरी पर ले जा सकती थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक ने उस रणनीति पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है।

सामाजिक न्याय बनाम पिछड़ावाद की राजनीति

बिहार की राजनीति में पिछड़ावाद का उदय कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण आंदोलन से हुआ और इसे लालू प्रसाद यादव ने ‘सामाजिक न्याय’ का नाम देकर चरम तक पहुंचाया। यही राजनीति लंबे समय तक राजद को सत्ता के केंद्र में बनाए रखने का आधार बनी।
हालांकि, जब लालू यादव और नीतीश कुमार की राहें अलग हुईं, तो पिछड़ावाद की राजनीति भी दो हिस्सों में बंट गई—एक ओर यादव केंद्रित राजनीति और दूसरी ओर कुर्मी-कुशवाहा नेतृत्व वाला धड़ा, जिसकी कमान नीतीश कुमार के हाथ में आई। भाजपा के साथ गठजोड़ के बाद यही धड़ा सत्ता में मजबूत होता चला गया और राजद हाशिये पर पहुंचती गई।

यूजीसी के नए नियम और सियासी उबाल

यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से नए नियम लागू किए थे। इसके तहत इक्विटी कमेटियों के गठन और इनमें आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) के प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया।
इन नियमों के बाद समाज में एक बार फिर अगड़ा-पिछड़ा की बहस तेज हो गई। जिन दलों का आधार सवर्ण वोट माना जाता है, उन्होंने रणनीतिक चुप्पी साध ली। भाजपा, एनडीए के सहयोगी दल और यहां तक कि कांग्रेस भी खुलकर सामने नहीं आई।

राजद को मिला राजनीतिक मौका

इसी चुप्पी के बीच राजद ने खुद को पिछड़ों की सबसे मुखर आवाज के रूप में पेश करना शुरू किया। चुनावी हार के बाद ठहरी हुई राजद की राजनीति में यूजीसी नियमों ने नई जान फूंकी। हालात ऐसे बने कि राजद के नेता सड़कों पर उतर आए और विरोध को धार देने लगे।
दिलचस्प बात यह रही कि यूजीसी नियम केंद्र सरकार के दौर में आए, इसके बावजूद राजद का विरोध अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार के समर्थन जैसा दिखने लगा—क्योंकि मुद्दा पिछड़े वर्गों के अधिकारों से जुड़ा था।

‘सीक्रेट एजेंडा’ पर लगा विराम

राजद की रणनीति साफ थी—इस मुद्दे को आगे बढ़ाकर उस पिछड़े वोट बैंक को फिर से अपने पाले में लाना, जो समय के साथ नीतीश कुमार के साथ चला गया। पार्टी का लक्ष्य मंडल राजनीति को नए सांचे में ढालकर “100 में 60” के समीकरण को फिर से साधना था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इस पूरे आंदोलन पर असमय तुषारापात कर दिया। राजद के भीतर इसे सिर्फ कानूनी फैसला नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक अवसर के छिन जाने के रूप में देखा जा रहा है।

सियासी मायने

राजद के गलियारों में इस फैसले को लेकर नाराजगी और झुंझलाहट साफ महसूस की जा रही है। पार्टी जिस मुद्दे के सहारे खुद को फिर से केंद्र में लाना चाहती थी, वह फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया।
अब सवाल यह है कि क्या राजद कोई नया मुद्दा तलाश पाएगी, या फिर पिछड़ावाद की राजनीति एक बार फिर न्यायिक फैसलों और बदलती सियासी परिस्थितियों के बीच सिमट कर रह जाएगी।

 

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