Tuesday, July 21

पति फौज में, पत्नी पुलिस में; बेटी के जन्म पर मचा विवाद, DNA से सुलझेगा मामला

जबलपुर, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक तलाक याचिका में फैमिली कोर्ट द्वारा आदेशित नाबालिग बच्ची के DNA टेस्ट को सही ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह टेस्ट केवल व्यभिचार (धोखेबाजी) के आरोपों की जांच के लिए है, न कि बच्चे को अवैध घोषित करने या उसकी कानूनी स्थिति पर असर डालने के लिए।

यह विवाद एक ऐसे दंपत्ति के बीच खड़ा हुआ है, जहां पति भारतीय सेना में तैनात हैं और पत्नी मध्य प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल। पति ने आरोप लगाया कि बच्ची की गणना अवधि में उन्होंने पत्नी से शारीरिक संबंध नहीं बनाए थे। पति के वकील ने कोर्ट को बताया कि गर्भावस्था के चार दिनों के भीतर गर्भधारण का पता लगाना नामुमकिन है। इसके आधार पर पति ने DNA टेस्ट कराने की मांग की।

कोर्ट ने पत्नी के इनकार के प्रावधान स्पष्ट किए:
कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी DNA नमूना देने से इनकार करती है, तो फैमिली कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(h) या बीएसए 2023 के तहत अनुमान लगा सकता है। इसका मतलब है कि पति द्वारा प्रस्तुत तथ्य सही माने जाएंगे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि टेस्ट का उद्देश्य केवल सच्चाई का पता लगाना है, न कि बच्ची की वैधता पर संदेह करना।

पहले भी हो चुकी हैं याचिकाएं:
यह दंपत्ति तीसरी बार तलाक याचिका लेकर कोर्ट में उपस्थित हुआ है। पहली याचिका 2019 में आपसी सहमति से वापस ली गई थी। दूसरी याचिका उसी वर्ष दायर हुई, लेकिन पत्नी के अनुपस्थित रहने के कारण कार्यवाही स्थगित हो गई। वर्तमान याचिका 2021 में व्यभिचार के आरोप पर आधारित है। फैमिली कोर्ट ने 22 अगस्त को DNA टेस्ट का आदेश दिया था, जिसे पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

वकीलों के तर्क:
पत्नी के वकील ने कहा कि यह परीक्षण निजता और पहचान के अधिकार का उल्लंघन करेगा और बच्चे के भविष्य पर कलंक डाल सकता है। वहीं, पति के वकील ने अदालत को बताया कि यह चुनौती केवल कार्यवाही को रोकने और महत्वपूर्ण तथ्य दबाने का प्रयास है। कोर्ट ने माना कि जब पति पुख्ता सबूत दे रहा है कि वह उस समय घर पर नहीं था, तो सच का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट कराना उचित है।

हाई कोर्ट के आदेश से यह विवाद अब DNA परीक्षण के माध्यम से सुलझाने की राह पर है और बच्ची की कानूनी स्थिति सुरक्षित बनी रहेगी।

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