Tuesday, July 21

इस्लाम में नए साल का जश्न जायज़ नहीं: मौलाना बरेलवी कहा—31 दिसंबर की रात फूहड़ता, शोर-शराबा और फिजूलखर्ची होती है

 

नया साल 2026 आने से पहले जश्न की तैयारियों के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मुसलमानों से 1 जनवरी को नया साल न मनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि शरीयत-ए-इस्लामिया की रोशनी में नए साल का जश्न मनाना जायज़ नहीं है और इस्लाम इसकी अनुमति नहीं देता।

 

मौलाना बरेलवी का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग नए साल के जश्न को लेकर सवाल कर रहे हैं, ऐसे में इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।

 

मोहर्रम से शुरू होता है इस्लामी नया साल

 

मौलाना ने कहा कि इस्लामी कैलेंडर के अनुसार नया साल मोहर्रम माह से शुरू होता है, जबकि हिंदू पंचांग में नया वर्ष चैत्र मास से आरंभ होता है। 1 जनवरी को मनाया जाने वाला नया साल यूरोपीय संस्कृति से जुड़ा हुआ है, जिसे मुख्य रूप से ईसाई समुदाय द्वारा मनाया जाता है। ऐसे में मुसलमानों को इस परंपरा से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

 

फूहड़ता और फिजूलखर्ची का माध्यम है जश्न

 

उन्होंने कहा, “जश्न का मतलब 31 दिसंबर की रात में नाच-गाना, हंगामा, शोर-शराबा, फूहड़ता और फिजूलखर्ची करना होता है। शरीयत इसकी इजाजत नहीं देती।” मौलाना ने मुस्लिम युवाओं—लड़कों और लड़कियों—से अपील की कि वे इस तरह के जश्न से पूरी तरह परहेज करें।

 

उलमा सख्ती से रोकेंगे

 

मौलाना बरेलवी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कहीं से इस तरह के जश्न की सूचना मिलती है, तो उलमा-ए-किराम सख्ती से इसे रोकेंगे। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को अपनी धार्मिक पहचान और इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप जीवन जीना चाहिए।

 

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