Tuesday, July 21

प्यार और राजनीति की कहानी: बिहार के पहले OBC मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह की अनकही कहानी

पटना (बिहार)
कहते हैं कि सच्चा प्यार किसी की परवाह नहीं करता। बिहार के पहले ओबीसी मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह की जीवन कहानी इस कहावत को सही ठहराती है। जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले सतीश प्रसाद सिंह ने अपने प्रेम के लिए परिवार को ठुकरा दिया और राजनीति में भी नाम कमाया।

प्यार की शुरुआत

साल 1960 की बात है। खगड़िया जिले के रहने वाले सतीश प्रसाद सिंह को पढ़ाई के लिए पटना भेजा गया था। वहीं, आरडीजे कॉलेज में उनकी मुलाकात सहपाठी ज्ञानकला से हुई। दोनों के बीच गहरा और आत्मीय प्रेम विकसित हुआ।

धीरे-धीरे यह प्यार परवान चढ़ा और सतीश प्रसाद ने ज्ञानकला से शादी का प्रस्ताव रखा। दोनों परिवारों ने इसका विरोध किया। सतीश प्रसाद और ज्ञानकला ने तय किया कि प्यार और परिवार में से एक को चुनना पड़े तो वे प्यार को चुनेंगे। इसके बाद दोनों ने परिवार का साथ छोड़कर अपना जीवन अलग से बसाया।

राजनीति में कदम

प्यार की राह चुनने के बाद सतीश प्रसाद सिंह ने राजनीति में कदम रखा। 1962 में परबत्ता विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 1964 में उप चुनाव में फिर चुनाव लड़ा, लेकिन परिणाम वही रहा।

छोटे लेकिन ऐतिहासिक पांच दिन

तीसरी बार 1967 में चुनाव लड़े और जीते। इस प्रकार वे बिहार के छठवें मुख्यमंत्री बने। हालांकि, मुख्यमंत्री पद पर उनका कार्यकाल सिर्फ पांच दिन का था। इस दौरान उन्होंने ऐतिहासिक निर्णय लिया—पहली कैबिनेट बैठक में बिहार के किसानों को आलू राज्य के बाहर बेचने की अनुमति दी। इससे कुशवाहा समाज के किसानों को आर्थिक लाभ हुआ और समाज के लिए मजबूत राजनीतिक पहचान बनी।

प्यार और समाज के लिए बलिदान

सतीश प्रसाद सिंह का जीवन यह साबित करता है कि सच्चा प्यार और समाज सेवा कभी भी आसान नहीं होती। अपने प्यार और जनता के हित के लिए उन्होंने परिवार, जमींदारी और राजनीतिक चुनौतियों को झेला।

आज भी उन्हें बिहार की राजनीति में मजबूत कपल और समाजसेवी नेता के रूप में याद किया जाता है।

 

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