Tuesday, July 21

Opinion: ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया बन गए मासूमों के दिमाग के ‘साइलेंट किलर’, भारत में भी तय हो न्यूनतम उम्र

भारत को बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को गंभीर खतरे की घंटी की तरह देखना चाहिए। Economic Survey 2025-26 के अनुसार, भारतीय बच्चे सुरक्षित माने जाने वाली सीमा से दोगुना समय मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन पर बिता रहे हैं। दुनिया में सबसे सस्ता इंटरनेट होने के बावजूद इसका सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को हो रहा है।

गाजियाबाद की दर्दनाक घटना:
हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों ने एक बिल्डिंग के 9वें फ्लोर से कूदकर अपनी जान दे दी। शुरुआती जांच के अनुसार, इस घटना के पीछे टास्क-बेस्ड गेमिंग की लत और ऑनलाइन गेम्स का मानसिक दबाव बताया जा रहा है। आज बच्चे स्मार्टफोन को खिलौने की तरह नहीं बल्कि नुकसान पहुँचाने वाले ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स मनोरंजन के अलावा मासूम दिमागों को हाईजैक करने वाले ‘साइलेंट किलर’ बन चुके हैं।

डिजिटल दुनिया का पुराना खतरा:
यह घटना पहली नहीं है। साल 2017 में ब्लू व्हेल चैलेंज ने बच्चों को आत्महत्या के लिए उकसाया था। इसके बाद मोमो चैलेंज और पिंक व्हेल जैसे टास्क-बेस्ड गेम्स ने भी कई मासूमों की जिंदगी प्रभावित की। आज के PUBG, Free Fire और अन्य टास्क-बेस्ड गेम्स बच्चों को चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना रहे हैं। ये गेम्स केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि मानसिक हथियार बनकर बच्चों को अवसाद और मानसिक संकट की ओर धकेल रहे हैं।

बढ़ता स्क्रीन टाइम भारत के लिए खतरे की घंटी:
Economic Survey के अनुसार, भारतीय बच्चे सुरक्षित सीमा से दोगुना समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं। रील्स और शॉर्ट्स जैसे डिजिटल कंटेंट ने बच्चों की अटेंशन स्पैन को पहले ही प्रभावित कर दिया है। गाजियाबाद की घटना दिखाती है कि बच्चे वर्चुअल कैरेक्टर्स और गेम्स के प्यार में पड़ चुके हैं। ऐसे में आज ही कड़े नियम लागू करना जरूरी है, ताकि बच्चे ब्लू व्हेल और कोरियन लव गेम जैसे खतरनाक गेम्स से दूर रहें।

दुनियाभर में उठ रही पाबंदी की मांग:
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बना है, जिसने बच्चों के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह से बैन कर दिया। नॉर्वे और डेनमार्क ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया का एक्सेस 13 साल से बढ़ाकर 15 साल कर दिया है। यूरोप और यूके भी इसी दिशा में सोच रहे हैं। भारत को भी इस दिशा में तुरंत कदम बढ़ाकर टेक कंपनियों से बच्चों के लिए नियमों का कड़ाई से पालन करवाना चाहिए।

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