Tuesday, July 21

अमेरिकी जीएम पशु चारा अब भारत में प्रवेश के क़रीब, क्यों बनी दशकों से चिंता का विषय

नई दिल्ली: अमेरिका से जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) पशु चारा आयात का मसला भारत में लंबे समय से विवादित और संवेदनशील बना हुआ है। अमेरिकी डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेंस विद सॉल्युबल्स (DDGS) का मुद्दा राजनीतिक और व्यावसायिक दोनों दृष्टिकोण से चर्चा में रहा है, और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता में यह कई दशक से अहम टॉपिक रहा है।

एक दशक से जारी बहस
भारत और अमेरिका के बीच मंत्रालयों स्तर पर कई दौर की चर्चा हुई है। भारत की जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) ने इस पर बार-बार अध्ययन किया और कम से कम दो उप-समितियों ने गहन मंथन भी किया। 2017 में GEAC को देशभर से ऐसे कई आवेदन मिले, जिनमें अमेरिकी DDGS के आयात की अनुमति मांगी गई। इसी दौरान पॉल्ट्री फार्मों ने जीएम सोयाबीन और मक्के के आयात के लिए आवेदन दायर किए।

प्रोटीन की बढ़ती मांग और सस्ते विकल्प
भारत में पशु चारे में मक्के पर बढ़ती निर्भरता ने उद्योग को DDGS और अल्फाल्फा घास आयात के लिए प्रेरित किया। इसका मुख्य कारण अधिक प्रोटीन और सस्ते विकल्प की उपलब्धता है। जुलाई 2025 में GEAC ने वैज्ञानिक आधार पर कहा कि DDGS का इस्तेमाल पशुओं के स्वास्थ्य, प्रदर्शन और उत्पाद की गुणवत्ता के लिए किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट और जीएम सरसों
जीएम उत्पादों को लेकर आशंकाएं केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं। पर्यावरणीय प्रभाव और मानव स्वास्थ्य पर संभावित जोखिमों की वजह से 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने GEAC की जीएम सरसों की मंजूरी पर रोक लगा दी। इसके साथ ही भारत में एक राष्ट्रीय जीएम नीति की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है, जो अब तक लागू नहीं हुई है।

आने वाला फ्रेमवर्क क्या बदल सकता है
अमेरिका के साथ नवीनतम फ्रेमवर्क के तहत भारतीय बाजार में अमेरिकी जीएम पशु चारा की एंट्री का मार्ग साफ हो सकता है। इससे पशु पालन उद्योग को प्रोटीन युक्त और किफायती चारा उपलब्ध होगा, लेकिन स्वास्थ्य, पर्यावरण और नीति संबंधी चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं।

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