Tuesday, July 21

अपनी ही सरकार पर JDU विधायक कोमल सिंह के सवाल, खेल मंत्री श्रेयसी सिंह से सदन में तीखी बहस

पटना: बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दूसरे दिन सत्ता पक्ष के भीतर ही सवाल-जवाब का ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने सदन का माहौल गरमा दिया। गायघाट (मुजफ्फरपुर) से जेडीयू विधायक कोमल सिंह ने अपने क्षेत्र में स्टेडियम निर्माण को लेकर सरकार के दावों पर गंभीर सवाल उठाए और विभागीय रिपोर्ट को भ्रामक बताया। उनके आरोपों के जवाब में खेल मंत्री श्रेयसी सिंह ने तकनीकी प्रमाणों के साथ सरकार का पक्ष रखा।

प्रश्नकाल के दौरान कोमल सिंह ने कहा कि जारंग और अथवारा पंचायत में स्टेडियम निर्माण को लेकर जो रिपोर्ट दी गई है, वह जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन स्थलों को स्टेडियम बताया जा रहा है, वे दरअसल स्कूलों के खाली मैदान हैं, जहां खेल सुविधाओं का अभाव है। विधायक ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की।

इस पर खेल मंत्री श्रेयसी सिंह ने सदन को बताया कि संबंधित स्थानों पर फुटबॉल स्टेडियम का निर्माण जीओ-टैगिंग तकनीक के तहत किया गया है और विभाग के पास इसके प्रमाण स्वरूप तस्वीरें मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि सरकार पारदर्शिता के साथ काम कर रही है और किसी भी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं है।

बहस तेज होती देख मंत्री ने विधायक को संबंधित स्थलों का संयुक्त निरीक्षण कराने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि दौरे के दौरान कोई कमी पाई जाती है तो विभाग तत्काल सुधारात्मक कदम उठाएगा। इस सहमति के बाद मामला शांत हुआ।

राजनीतिक विरासत से आईं दोनों युवा चेहरे

सदन में आमने-सामने आईं कोमल सिंह और श्रेयसी सिंह बिहार की राजनीति के दो प्रमुख युवा चेहरे मानी जाती हैं। दोनों ही प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों से आती हैं। कोमल सिंह के पिता दिनेश प्रसाद सिंह जेडीयू के विधान पार्षद हैं, जबकि उनकी माता वीणा देवी वैशाली से लोकसभा सांसद हैं। एमबीए की पढ़ाई के बाद कोमल सिंह ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और 2025 में पहली बार विधायक चुनी गईं।

वहीं, अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज रह चुकी श्रेयसी सिंह जमुई से बीजेपी विधायक हैं और वर्तमान में बिहार की खेल मंत्री हैं। उनके पिता दिवंगत दिग्विजय सिंह पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे थे, जबकि उनकी माता पुतुल कुमारी भी सांसद रह चुकी हैं। श्रेयसी सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और एमबीए की पढ़ाई पूरी की है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह प्रकरण बताता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष के भीतर भी जवाबदेही की मांग संभव है, और युवा नेतृत्व अब मुद्दों पर खुलकर बोलने से परहेज नहीं कर रहा।

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